लोकसभा ने गुरुवार को वो संशोधन पास कर दिया है, जो UPI और दूसरे डिजिटल पेमेंट पर शुल्क (UPI MDR Charge) लगाने का रास्ता खोलता है। ये कराधान और अन्य कानून (संशोधन) विधेयक, 2026 का हिस्सा है, जिसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण मंगलवार को सदन में लाई थीं। हंगामे के बीच विधेयक बिना किसी चर्चा के ध्वनिमत से पास हुआ।
बदला सिर्फ एक हिस्सा है। भुगतान और निपटान प्रणाली अधिनियम, 2007 की धारा 10A बैंकों और पेमेंट कंपनियों को उन्हीं माध्यमों पर शुल्क लेने से रोकती है जो आयकर अधिनियम की धारा 269SU के तहत तय हैं, जैसे BHIM-UPI QR और RuPay डेबिट कार्ड। संशोधन के बाद ये सूची सरकार खुद बनाएगी। विधेयक कोई चार्ज नहीं लगाता, वो सिर्फ ताला खोलता है।
एक नज़र में
- क्या हुआ: 6 अगस्त को लोकसभा से पास, अब राज्यसभा में जाएगा
- क्या बदला: UPI को शुल्क से बचाने वाली धारा 10A की गारंटी हटी
- किस पर लगेगा: MDR दुकानदार पर, ग्राहक पर नहीं
- कितना: रिपोर्ट्स के अनुसार ₹2,000 से ऊपर के पेमेंट पर 0.25% से 0.4%
- कब से: दर, तारीख और सीमा, तीनों अभी तय नहीं हैं
UPI MDR Charge क्या है, और ₹2,000 की लकीर कहाँ से आई
आप ₹2,500 का सामान डेबिट कार्ड से खरीदते हैं, तो दुकानदार के खाते में पूरे ₹2,500 नहीं पहुँचते। बैंक और पेमेंट कंपनी बीच में से अपना हिस्सा काट लेते हैं। यही मर्चेंट डिस्काउंट रेट है। RBI के हिसाब से डेबिट कार्ड पर ये 0.90% तक जा सकता है, और NPCI के नियमों में UPI के दुकान वाले पेमेंट के लिए 0.30% तक की गुंजाइश पहले से लिखी है।
एक गलतफहमी यहीं दूर कर लें। सेविंग अकाउंट से ऑनलाइन किए गए NEFT पर भी ग्राहक से कोई शुल्क नहीं लिया जाता, RBI ने बैंकों को यही निर्देश जनवरी 2020 से दे रखा है। ठीक उसी महीने से UPI पर MDR भी शून्य हुआ था।
पर वो शून्य अपने आप नहीं चल रहा था। सरकार हर साल बैंकों को इसकी भरपाई करती रही, और ये रकम 2021-22 के ₹1,389 करोड़ से बढ़कर 2023-24 में ₹3,631 करोड़ हो गई, जिसमें ₹3,268 करोड़ अकेले BHIM-UPI के हिस्से आए। फिर मार्च 2025 में कैबिनेट ने 2024-25 की जो स्कीम मंज़ूर की, उसमें RuPay कार्ड बाहर हो गया और UPI के लिए रकम ₹1,500 करोड़ रह गई, यानी आधे से भी कम। इंसेंटिव भी सिर्फ छोटे दुकानदारों के ₹2,000 तक के पेमेंट पर रखा गया।
यानी जिस आंकड़े को अब नया नियम बताया जा रहा है, सरकार की अपनी तालिका में “₹2,000 तक” और “₹2,000 से ऊपर” के दो खाने दो साल से बने हुए हैं।
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को यही बात खुलकर कही। उनके अनुसार MDR के ढाँचे पर बात करना अभी जल्दबाज़ी है, पर विकल्प सीधे हैं। या तो जनता ये खर्च टैक्स के ज़रिए उठाए, या जो इस्तेमाल कर रहा है वही भरे।

कितना कटेगा, और किन पेमेंट पर
रिपोर्ट्स के अनुसार दुकानों को किए गए ₹2,000 से ऊपर के UPI पेमेंट पर 0.25% से 0.4% MDR लग सकता है। एक व्यक्ति से दूसरे को भेजे गए पैसे इससे बाहर रहने की उम्मीद है। गणित बड़ा नहीं है, ₹2,500 के पेमेंट पर ये रकम ₹6 से ₹10 के बीच बैठती है।
चाय, ऑटो और सब्ज़ी जैसे रोज़ के पेमेंट इस लकीर के नीचे हैं। ऊपर स्कूल की फीस, बिजली का बिल, महीने का राशन और EMI आते हैं। सरकारी अनुमान के अनुसार ये सीमा कुल UPI लेनदेन के करीब 5% को छूती है, लेकिन कुल रकम का 65% इन्हीं 5% में है। जुलाई 2026 में UPI पर 23.66 अरब लेनदेन हुए, कुल ₹29.88 लाख करोड़ के।
ग्लोबल ब्रोकरेज Jefferies के एक नोट के अनुसार ₹2,000 से ऊपर 15 से 30 बेसिस पॉइंट का MDR 2027-28 तक ₹5,000 करोड़ से ₹10,000 करोड़ का राजस्व खड़ा कर सकता है। पर सीतारमण ने साफ किया है कि NPCI की अगुवाई वाली UPI एंड सर्विसेज़ स्टीयरिंग कमेटी ने अभी कोई फैसला नहीं लिया है।
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सरकार का जवाब, कारोबारियों की दो राय
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि संशोधन उस कानूनी गारंटी को हटाता है जिसने UPI को मुफ्त रखा था, और जो शुल्क लगेगा वो घूमकर आम आदमी तक पहुँचेगा। उन्होंने जोड़ा कि RBI ने 2025-26 में केंद्र को ₹2.86 लाख करोड़ का सरप्लस दिया है, तो ये बोझ डालने की ज़रूरत नहीं है।
सीतारमण ने X पर जवाब दिया कि अफवाह फैलाने से पहले जयराम रमेश ये समझ लें, “मर्चेंट डिस्काउंट रेट सिर्फ दुकानदारों पर लागू होता है, आखिरी यूज़र या ग्राहक पर नहीं।” उनके अनुसार इससे बैंकों और फिनटेक कंपनियों को इंफ्रास्ट्रक्चर और सुरक्षा पर ज़्यादा निवेश करने में मदद मिलेगी।
कारोबारी संगठनों में एक राय नहीं है। कन्फेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स के महामंत्री और BJP सांसद प्रवीण खंडेलवाल ने इंतज़ार करने की बात कही है, साथ में ये भी कि ₹2,000 तक की सीमा आम आदमी की है और उस पर बोझ नहीं आना चाहिए। वहीँ ASSOCHAM के महासचिव सौरभ सान्याल इसे MSME के लिए झटका बता रहे हैं, क्योंकि डिजिटल पेमेंट सबसे ज़्यादा छोटे और मझोले कारोबारी ही ले रहे हैं। उनका सुझाव है कि MDR सिर्फ ₹1 करोड़ से ऊपर के लेनदेन पर लगे।
हमारे अनुसार, दिक़्क़त चार्ज की नहीं, तरीके की है
11 जून 2025 को वित्त मंत्रालय ने UPI पर MDR की खबरों को “पूरी तरह झूठी, बेबुनियाद और भ्रामक” बताया था, और लिखा था कि ऐसी अटकलें लोगों में बेवजह डर पैदा करती हैं। करीब चौदह महीने बाद वही रास्ता कानून बनकर लोकसभा से निकल गया, और इस बार सदन में एक शब्द की बहस नहीं हुई।
सरकार की दलील में दम है। शून्य MDR टैक्स के पैसे से चल रहा था और वो खर्च हर साल बढ़ रहा था।
पर चार्ज कानूनी तौर पर दुकानदार पर लगने का मतलब ये नहीं कि वहीं रुक जाएगा। सोचिए कि आप गाड़ी में ₹2,500 का पेट्रोल भरवाकर फोन निकालें, और सामने से सुनने को मिले कि इतने का कैश दे दीजिए। पेमेंट वहीं अटक जाता है और आपको ATM ढूँढना पड़ता है। दूसरा पक्ष भी है, कार्ड पर MDR सालों से लग रहा है और ज़्यादातर दुकानदार उसे ग्राहक पर नहीं डालते।
असली कमी कहीं और है। ताला खुल गया, लेकिन दर कितनी होगी, अधिकतम कितना कटेगा, छोटे दुकानदारों को छूट मिलेगी या नहीं, और लागू कब से होगा, इनमें से एक भी जवाब कानून में दर्ज नहीं है। सब एक कमेटी पर छोड़ा गया है। जिस सुविधा पर हर महीने 23 अरब से ज़्यादा लेनदेन टिके हैं, उसकी कीमत तय करने वाली प्रक्रिया इतनी बंद नहीं होनी चाहिए।
फिलहाल आपके UPI ऐप में कुछ नहीं बदला है। पर ये मान लेना अब मुश्किल है कि UPI हमेशा वैसा ही मुफ्त रहेगा जैसा 2020 से चला आ रहा था।




































